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Vrat Katha: आरोग्य के देवता भगवान भास्कर को प्रसन्न करने का क्या है तरीका

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Vrat Katha: भगवान को प्रसन्न करने के लिए हर व्यक्ति अपने-अपने प्रयास करते रहते है. कोई पूजा-अर्चना और दान-दक्षिणा करके ईश्वर की कृपा प्राप्त करता है तो वहीं कोई व्रत करके. आज हम आपको बताने जा रहे हैं रविवार को व्रत करने से किन समस्याओं से मुक्ति मिलती है और कौन से भगवान की पूजा-अर्चना करके उन्हें प्रसन्न किया जा सकता है और साथ ही इस दिन व्रत रहने वालों को किस कथा को सुनना चाहिए. आइए जानते हैं –

रविवार का दिन सूर्य देव को समर्पित है. सूर्य देव बहुत कल्याणकारी देव हैं. सूर्य देव की पूजा और व्रत करने से प्राण ऊर्जा बढ़ती है, कष्ट दूर होते हैं और जीवन में खुशहाली आती है. भास्कर भगवान का व्रत सभी मनोकामनाओं को पूरा करता है. मान सम्मान में वृद्धि तथा शत्रु नाश करता है. सांसारिक कष्टों से मुक्ति मिलती है. रविवार का व्रत स्वास्थ्य के लिये उत्तम है. त्वचा रोग तथा कुण्ठ रोग से मुक्ति पाने के लिये भी यह व्रत किया जाता है. आइए पढ़ते हैं रविवार व्रत की पावन कथा…

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रविवार व्रत विधि – रविवार का व्रत करने वाले व्यक्ति को प्रातःकाल स्नानादि से निवृत्त होकर स्वच्छ वस्त्र धारण करने चाहिए. पूजा स्थल की साफ-सफाई कर सूर्यदेव की पूजा करनी चाहिए. रविवार के व्रती को नमक तथा तैल युक्त भोजन नहीं करना चाहिए. इस व्रत में भोजन सूर्यास्त होने से पहले ही कर लेना चाहिए. यदि भोजन करने से पूर्व सूर्य अस्त हो जाये तो दूसरे दिन सूर्य के उदय हो जाने पर अर्घ्य देने के बाद ही भोजन करना चाहिए. रविवार के दिन पूजा  करते समय कथा पढ़ी व दूसरों को सुनाई जाती है.

रविवार व्रत कथा – एक वृद्धा थी. वह प्रत्येक रविवार को सवेरे ही घर साफ करके, स्नान आदि कर भगवान की पूजा करती थी. भगवान को भोग लगाकर स्वयं भोजन करती थी. भगवान की कृपा से उसके घर में सब प्रकार का सुख चैन था. उसकी पड़ोसन, जिसकी गाय का गोबर लीपने के लिए वह वृद्धा लाती थी, उस वृद्धा की सम्पन्नता से जलने लगी. यह सोच कर कि यह वृद्धा मेरी गाय का गोबर ले जाती है, वह अपनी गाय को घर के भीतर बांधने लगी. उस दिन रविवार था. वृद्धा को गाय का गोबर नहीं मिला. अतः वह अपना घर न लीप सकी. उस दिन उसने भोजन नहीं बनाया, न भगवान को भोग लगाया और न स्वयं भोजन किया.

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रात्रि में वह निराहार ही सो गई. रात्रि में भगवान ने उसे स्वप्न में दर्शन दिये और भोजन न बनाने तथा भोग न लगाने का कारण पूछा. वृद्धा ने कहा, “गोबर नहीं मिला अतः आपका भोग नहीं लगा सकी.” भगवान ने उससे कहा, “हे माता मैं आपसे बहुत प्रसन्न हूं. मैं आपको ऐसी गाय देता हूं जो सब इच्छाओं को पूरा करती है. मैं निर्धन को धन और बांझ स्त्रियों को पुत्र देता हूं तथा अन्त समय में मोक्ष देता हूं .

स्वप्न में वरदान देकर भगवान अंतर्ध्यान हो गए. प्रातः काल जब वृद्धा माता की आंख खुली तो उसने देखा की आंगन में एक अति सुन्दर गाय और बछड़ा बंधे हुए हैं. गाय और बछड़े को देखकर वृद्धा अत्यन्त प्रसन्न हुई. उसने उनको घर के बाहर बांध दिया और वहीं उनके खाने के लिये चारा डाल दिया. वृद्धा के यहां गाय – बछड़ा बंधा देखकर पड़ोसन को बहुत ईर्ष्या हुई. जब उसने देखा कि गाय ने सोने का गोबर दिया है तो उसने वह उठा लिया और उसकी जगह अपनी गाय का गोबर रख दिया. वह प्रतिदिन ऐसा ही करती. वृद्धा को उसकी इस चालाकी के बारे में कुछ पता नहीं चला. एक दिन संध्या के समय बड़ी जोर की आंधी आई. वृद्धा ने आंधी के भय से अपनी गाय और बछड़ा घर के भीतर बांध लिए. प्रातः काल उठ कर उसने देखा कि गाय ने सोने का गोबर दिया है. यह देखकर उसके आश्चर्य की सीमा नहीं रही.

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अब वह गाय घर के भीतर बांधने लगी. जब पड़ोसन को सोने का गोबर उठाने को नहीं मिला तो व ईर्ष्या के कारण राजा की सभा में जाकर कहा, “महाराज मेरे पड़ोस में एक वृद्धा के पास ऐसी गाय है जो सोने का गोबर देती है. वह वृद्धा इतने सोने का क्या करेगी. आप वह सोना प्राप्त कर प्रजा का पालन करिये. उसकी बात सुनकर राजा ने अपने कर्मचारियों को वृद्धा के घर से गाय – बछड़ा खोल कर लाने का आदेश दिया. वृद्धा भगवान का भोग लगाकर भोजन ग्रहण करने जा रही थी कि राजा के कर्मचारी गाय खोलकर ले गये. वह बहुत रोई चिल्लाई पर उसकी किसी ने नहीं सुनी. वह गाय के वियोग में भोजन नहीं कर सकी और रात भर रो-रो कर ईश्वर से गाय को पुनः प्राप्त करने की प्रार्थना करती रही. राजा गाय को देखकर बहुत प्रसन्न हुआ. लेकिन प्रातःकाल जब वह सोकर उठा तो उसने देखा कि सारे महल में गोबर ही गोबर भरा हुआ है.

राजा यह देखकर परेशान हो गया. भगवान ने रात्रि में राजा के स्वप्न में कहा, ‘हे राजा गाय वृद्धा को लौटा देना. इसी में तुम्हारी भलाई है. उसके रविवार के व्रत से प्रसन्न होकर मैंने यह गाय उसे दी थी. राजा की आंख तुरन्त खुल गई. फिर वह सो नहीं सका. प्रातः होते ही राजा ने वृद्धा को महल में बुलाकर बहुत से धन और सम्मान के साथ गाय – बछड़ा लौटा दिया तथा अपने कार्य के लिये क्षमा मांगी. इसके बाद राजा ने उसकी पड़ोसन को बुलाकर उचित दंड दिया. इसके बाद राजा के महल की गंदगी दूर हुई. राजा स्वयं रविवार का व्रत करने लगा और उसने अपनी प्रजा को भी रविवार का व्रत करने का आदेश दिया. राजा प्रजा सब सुख से रहने लगे . 

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